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1951 में आंबेडकर ने नेहरु पर कहा – समझना मुश्किल है ये भारत के लिए काम कर रहा है या चीन के लिए

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अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस थे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थाई मेम्बर, यानि वीटो पॉवर वाले देश, अमेरिका की ज्यादा चलती थी

अमेरिका ने एशिया के भी एक बड़े देश को सुरक्षा परिषद् का मेम्बर बनाने का प्रस्ताव सहयोगियों के सामने रखा, सहयोगियों ने अमेरिका को कह दिया की आप ही खोजो

अमेरिका एक लोकतंत्र था उसे एशिया में 2 देश दिखाई दिए, भारत और चीन, दोनों बड़े देश थे, पर अमेरिका ने भारत को वरीयता दी, कारण था की भारत भी लोकतंत्र था, जबकि चीन कम्युनिस्ट तानाशाही वाला देश जो आज भी है

अमेरिका ने लोकतंत्र होने के नाते भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई मेम्बर बनने का ऑफर दिया, उन दिनों नेहरु के सर पर चीन परस्ती सवार थी, उसी तरह जैसे इन दोनों सिद्धू के सर पर पाकिस्तान परस्ती सवार है

नेहरु ने अमेरिका के ऑफर को ठुकरा दिया और चीन को ये ऑफर भेज दिया, अमेरिका को इस बात का काफी बुरा भी लगा

अमेरिका चीन को पसंद नहीं करता था चूँकि वो एक लोकतंत्र नहीं था, आनाकानी होने लगी तो चीन भी अपना कैंपेन दुनिया भर में करने लगा, दुनिया के देशों से अपने लिए समर्थन मांगने लगा

आप जानकार चौंक जायेंगे की नेहरु भी चीन के लिए कैंपेन कर रहा था, और दुनिया के देशों को कह रहा था की चीन का साथ दीजिये

अक्टूबर 1951 में इसी पर भीमराव रामजी आंबेडकर ने एक बयान दिया था, इस बयान के बारे में इतिहासकार और चाटुकार लोग जनता को नहीं बताते

अम्बेरकर ने नेहरु की विदेश नीति पर सवाल उठाये और उन्होंने कहा की – जवाहर लाल नेहरु चीन के लिए कैंपेन कर रहे है, समझना मुश्किल है की वो भारत के लिए काम करते है या चीन के लिए, भारत को सुरक्षा परिषद् का स्थाई मेम्बर बनने का न्योता मिला पर नेहरु चीन के लिए कैंपेन कर रहे है

जबकि उन्हें सबसे पहले भारत का हित सोचना चाहिए, चीन तो अपना कैंपेन खुद कर लेगा, भारत उसके लिए कैंपेन क्यों कर रहा है, ऐसा करके नेहरु अमेरिका को भी अपना शत्रु बना रहे है, अमेरिका चीन को पसंद नहीं करता पर नेहरु चीन के पक्ष में कैंपेन कर रहे है, तो अमेरिका से किसी भी प्रकार की मदद भारत को मिलनी मुश्किल ही होगी

आंबेडकर ने ये भी कहा था की नेहरु चीनी राष्ट्रपति माव के कर्मचारी की तरह काम कर रहे है, भारत की जगह चीन के लिए काम कर रहे है

आपकी जानकारी के लिए बता दें की चीन नेहरु की ही मदद से स्थाई मेम्बर बन गया और उसे संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग का विशेष अधिकार प्राप्त हो गया जिसे कहते है वीटो पॉवर, भारत तो आज भी स्थाई मेम्बर बनने के लिए जूझ ही रहा है

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